Weekly Articles kataksha : कप्तानी पारी,थानेदारी और प्रभारी,50 एकड़ में राखड़ डैम, कौन खेल रहा निगम गेम?सेटिंग में बंटा काम, रिटायरमेंट से 10 दिन पहले..विघ्नहर्ता और लालबत्ती,

News Power Zone
13 Min Read

Weekly Articles kataksh : कटाक्ष में पढ़िए कोरबा के कप्तानी पारी, थानेदारी और प्रभारी से लेकर 50 एकड़ के राखड़ डैम, निगम गेम, सेटिंग में बंटे काम, रिटायरमेंट से 10 दिन पहले सम्मान और विघ्नहर्ता-लालबत्ती तक के तीखे व्यंग्य।

 

कप्तानी पारी, थानेदारी और प्रभारी

 

Weekly Articles kataksh: कोरबा को प्रदेश का पावर सेंटर कहा जाता है। यहां सत्ता की हवा भी चलती है और पुलिस की कुर्सियां भी। इन दिनों महकमे में चर्चा किसी अपराध की नहीं, बल्कि कुर्सी की उम्र की है। कोई 23 दिन में चलता बना, कोई 70 दिन में और कोई 30 महीने से कप्तानी की पारी खेल रहा है।

मगर, पुलिस के पंडितों का अपना गणित होता है। वे पूछ रहे हैं कि 23 दिन की थानेदारी, 70 दिन की कोतवाली और 30 महीने की कप्तानी के बाद भी अगर तबादले की चर्चा में जुआरी और कबाड़ी ही आगे हैं, तो फिर पुलिसिंग कहां चल रही है।

जनता भी अब इस चर्चा में मजा लेने लगी है। लोग राजेश खन्ना_ के बाबू मोशाय को याद करने लगे हैं…थानेदारी लंबी नहीं, बस इतनी बड़ी होनी चाहिए कि तबादला आने से पहले थाना अपना लगने लगे। मगर कोरबा में अफसरी करना इतना आसान नहीं है।

पिछले हफ्ता 10 सितम्बर की तबादला सूची ने कई थानेदारों को सरप्राइज गिफ्ट दिया । 23 दिन की थानेदारी में साहब ने कुर्सी संभाली ही थी कि तबादले की चिट्ठी ने बता दिया..जनाब कुर्सी से ज्यादा उम्मीद मत रखिए।

अब कोतवाली का किस्सा देखिए। कानून-व्यवस्था संभालने के लिए जिसे भेजा गया, वे 70 दिन ही प्रभारी रह पाए। 70 दिन में कोई आदमी घर बदलने का सामान तक ठीक से नहीं खोल पाता, यहां साहब को कोतवाली ही बदलनी पड़ गई।

अब कप्तानी वाली पारी भी कम दिलचस्प नहीं है। साहब 30 महीने से मैदान में हैं। कभी चौका, कभी छक्का और कभी विकेट बचाने की कोशिश। लेकिन पुलिस की पिच पर सबसे बड़ा डर गेंदबाज का नहीं, तबादला सूची का होता है। गेंद तो दिखाई देती है, सूची कब आ जाए इसका पता नहीं चलता।

वैसे तबादला सरकारी नौकरी का हिस्सा है। आज यहां, कल वहां। कुर्सी सरकारी है, इसलिए उस पर बैठने की गारंटी नहीं होती। लेकिन दिक्कत तब होती है जब आदमी थाना समझने लगे और आदेश आकर उसे समझा दे कि भाई साहब, थाना आपका था ही कब?

आखिर थानेदारी कोई क्रिकेट की पारी तो है नहीं कि रन कम बने तो अगली पारी का इंतजार किया जाए। यहां तो सवाल कानून-व्यवस्था का है और जनता को स्कोर बोर्ड पर सिर्फ एक ही आंकड़ा चाहिए..इलाके में अपराध कम हुआ या नहीं। खबरीलाल की मानें तो असली खेल अब कुर्सी का नहीं, कुर्सी छोड़ने के बाद हिसाब का है।

 

50 एकड़ में राखड़ डैम, कौन खेल रहा निगम गेम?

 

अभिनेता प्राण की फिल्म उपकार का वह गीत आज भी व्यवस्था पर सटीक बैठता है, “कसमें वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या ”, लेकिन जब वादों की जमीन पर राख की परत जमने लगे तो गीत की अगली पंक्ति अपने आप याद आ जाती है, “देते हैं भगवान को धोखा, इंसां को क्या छोड़ेंगे ”

कुछ ऐसा ही दृश्यम इन दिनों नगर निगम के 50 एकड़ के कचरा डंपिंग यार्ड को लेकर दिखाई दे रहा है। यहां बायोगैस प्लांट लगाने के लिए गेल इंडिया से अनुबंध हुआ है। योजना के मुताबिक जमीन का समतलीकरण होना था। ऊपर की मिट्टी हटाकर लो-लाइन एरिया में फिलिंग की जानी थी और उसके बाद प्रस्तावित प्लांट के निर्माण का रास्ता साफ होना था।

योजना सुनने में अच्छी थी। पर्यावरण के लिहाज से भी आशा जगाने वाली। लेकिन खबरीलाल बताते हैं कि समतलीकरण के नाम पर मिट्टी की जगह राख ने एंट्री मार ली। प्री कास्ट से चल रहे बाउंड्रीवाल के सीएसईबी के ठेकेदार को राख फिलिंग की अनुमति मिल गई, जो पहले से सीएसईबी का राख ट्रांसपोर्टर भी बताया जाता है। यानी राख से रकम बनाने का खिलाड़ी पहले से मैदान में था।

बस फिर क्या था, अनुमति मिली और 50 एकड़ में राख का पहाड़ खड़ा होता चला गया। सवाल यह नहीं कि राख आई कहां से, सवाल यह है कि 50 एकड़ में राख भरने का यह गेम आखिर किसके इशारे पर चला?

निगम की अनुमति, ठेकेदार की सुविधा और 50 एकड़ में राख का पहाड़… संयोग कुछ ऐसा है कि जनमानस भी मंद मुस्कान के साथ वही गीत गुनगुना रहा है…

कसमें वादे प्यार वफा, सब बातें हैं बातों का क्या...” और कटाक्ष में अगली पंक्ति कुछ यूं बनती है…“देते हैं सरकार को धोखा, आम इंसान को क्या छोड़ेंगे…”

 

सेटिंग में बंटा काम, रिटायरमेंट से 10 दिन पहले सम्मान!

 

पुरानी कहावत है, “सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को।” अब यह कहावत ग्रामीण यांत्रिकी सेवा संभाग के ईई साहब पर कितनी सटीक बैठती है, इसका फैसला तो किसी निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकता है। मगर रिटायरमेंट से महज दस दिन पहले टीपी नगर के एक होटल में ठेकेदारों की ओर से हुआ सम्मान समारोह विभागीय गलियारों में प्रश्नों की ऐसी घंटी जरूर बजा गया है, जिसकी गूंज अब दूर तक सुनाई दे रही है।

 

असल में साहब छत्तीसगढ़ी कहावतों यानी हाना के भी किंग बताए जाते हैं। लिहाजा, कहते हैं कि उन्होंने हाना को ही अपना हथियार बनाया और पर्दे के पीछे ऐसा खेल रचा कि काम का बंटवारा भी चर्चा में आ गया। खबरीलाल बताते हैं कि साहब के कार्यकाल में कामों का बंटवारा कुछ ऐसा हुआ कि ठेकेदार खुश और फाइलें गुलजार रहीं। मानो सरकारी टेंडर नहीं, रेवड़ी का प्रसाद बांटा जा रहा हो।

चर्चा तो यह भी है कि पिछले दो साल के कार्यकाल की निष्पक्ष जांच हुई, तो ईई साहब की फाइलों के साथ डीए से लेकर टेंडर प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। हालांकि, इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है, इसका फैसला जांच के बाद ही होगा।

साहब की मधुर वाणी और शाम की महफिलों में अगरबत्ती सुलगाने के शौक की भी विभाग में खूब चर्चा रही। सवाल बस इतना है कि अगरबत्ती की खुशबू आखिर टेंडर की फाइलों तक कैसे पहुंच गई?

काम भी मिला और रिटायरमेंट से ठीक पहले सम्मान भी। अब यह सम्मान महज आत्मीयता थी या पुरानी ‘सेवा’ का आभार, यह तो सम्मान करने वाले ठेकेदार ही बेहतर जानते होंगे।

फिलहाल फाइलें खामोश हैं और विभाग में चर्चाएं गर्म हैं। अगर कभी जांच की हवा चली, तो सम्मान की माला से लेकर टेंडर की फाइल तक, कई गांठें खुल सकती हैं।

और साहब के कार्यकाल को करीब से समझने वाले कुछ एसडीओ तो मुस्कुराते हुए बस इतना ही कहते नजर आ रहे हैं…“सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को…”

 

विघ्नहर्ता और लालबत्ती

 

छत्तीसगढ़ के पावर सेंटर में इस बार गणपति बप्पा की पूछपरख कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। नेता, मंत्री और विधायक तो नफा-नुकसान देखकर भक्ति करने वाले संसारी जीव हैं, लेकिन इस बार लालबत्ती वाली सरकारी गाड़ियों में भी भक्ति का ट्रैफिक कुछ ज्यादा दिखाई दे रहा है।

शहर में जहां-तहां गणेश प्रतिमाओं की दुकानें सजी हैं। मूर्तियां बिक रही हैं, मोदक सज रहे हैं और इन्हीं दुकानों के आसपास लालबत्ती लगी सरकारी गाड़ियां बार-बार रुकती दिखाई दे रही हैं। अब सरकारी गाड़ी में बैठे भक्त मूर्ति खरीद रहे हैं या विघ्नहर्ता से कोई विशेष मनोकामना कर रहे हैं, यह तो वही जानें। खबरीलाल इतना जरूर बताते हैं कि इस बार बप्पा की डिमांड सामान्य से कुछ ज्यादा है।

वैसे भी भगवान श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं। उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है कि भक्त किस बिरादरी का है। भक्त अगर कलयुग में अफसर बना है तो पिछले जनम में अच्छे कर्म किए होंगे। और अगर इस जनम में भक्तिभाव से बप्पा की सेवा कर रहा है तो शायद अगले जनम की भी कुछ एडवांस बुकिंग हो जाए।

लेकिन कहते हैं ना, ऊपर वाले के दरबार में कुछ छुपा नहीं रहता। वहां जैसी करनी, वैसी भरनी वाला हिसाब चलता है। असल में पिछले चार पांच साल से ईडी प्रदेश कई अफसरों के पीछे पड़ी है। ईडी खुद इतनी पावरफुल है कि वो आईएएस, आईपीएस में भेद नहीं करती।

सूत्रों की माने तो ईडी करोड़ों रुपाए के कोयला, आबकारी और डीएमएफ घोटाले में कुछ सीनियर अफसरों फाइल पलट रही है, कुछ से तो पूछताछ भी हो रही है।

अफसरों को लगने लगा है कि आने वाले समय में उनकी परेशानी और बढ़ने वाली है। ऐसे में एक भगवान श्री गणेश ही विध्नहर्ता हैं जो उन्हें ईडी के प्रकोप से बचा सकते हैं। अब देखने वाली बात ये होगी कि ईडी के प्रकोप इन पर भारी पड़ता है या फिर विध्नहर्ता इन्हें इस परेशानी से उबार लेंगे।

 

 

एक तीर से दो शिकार, पेड़ भी लगाए और…

कहते हैं, असली खिलाड़ी वही होता है, जो लाठी भी सलामत रखे और सांप का काम भी तमाम कर दे। नगर निगम कोरबा में इन दिनों एक शांत स्वभाव के अफसर ने इस कहावत को कुछ इस अंदाज में सच साबित किया कि एक तीर से दो शिकार भी हुए और संदेश भी साफ चला गया… झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए!

असल में पॉवर सिटी में व्यापारी नेताओं के संरक्षण में बेतरतीब वाहन पार्किंग और दुकानों को सड़क तक सजाने की कवायद ने कई जगहों पर मानव निर्मित ट्रैफिक जाम की स्थिति पैदा कर दी थी। हालात ऐसे कि व्यवस्था पर सवाल उठने लगे थे। जब अतिक्रमण हटाने की कोशिश होती, तो किसी न किसी नेता का फोन कार्रवाई की राह में कांटे बनकर खड़ा हो जाता था।

अब हरित पट्टी विकास और वृक्षारोपण के नाम पर सड़क किनारे लगाए जा रहे पौधे पहली नजर में पर्यावरण प्रेम की खूबसूरत तस्वीर नजर आते हैं। राहगीरों को आने वाले दिनों में धूप से राहत मिलेगी, सड़कें हरी-भरी दिखेंगी और शहर का सौंदर्य भी निखरेगा। यानी एक फायदा तो पक्का!लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी कम दिलचस्प नहीं है।

जिन व्यापारियों ने सड़क किनारे अपनी दुकानों का विस्तार करते-करते फुटपाथ और सड़क तक को अपनी जागीर समझ लिया था, उनके लिए यही पौधे अब हरी लक्ष्मण रेखा बनने जा रहे हैं। अब ये पौधे बड़े होंगे तो छांव भी देंगे और अपनी जड़ों के साथ सड़क की सीमा भी मजबूत कर देंगे।

सबसे खास बात यह कि अफसर ने न किसी से सीधी बहस की, न किसी की दुकान पर डंडा चलाया और न ही कोई बड़ा विवाद खड़ा किया। बस, सड़क किनारे पौधे लगा दिए। अब ये पौधे बड़े होंगे तो छांव भी देंगे और अपनी जगह के साथ-साथ सड़क की सीमा भी तय करेंगे। यानी निगम का डंडा भी नहीं चला और अतिक्रमण की सीमा भी तय हो गई।इसे ही तो कहते हैं प्रशासनिक बुद्धिमत्ता का कमाल.. एक तीर से दो शिकार..!

 ✍️ अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

Share This Article