Assistant Revenue Inspector Property Department :नगर सरकार में आदेशों का नया गणित सामने आया है। फील्ड के सहायक राजस्व निरीक्षक को संपदा विभाग की जिम्मेदारी दिए जाने से प्रशासनिक व्यवस्था और कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
कोरबा। Assistant Revenue Inspector Property Department : नगर सरकार में इन दिनों काम कम और आदेशों का गणित कुछ ज्यादा ही दिलचस्प नजर आ रहा है। कौन सा कर्मचारी किस काम के लिए नियुक्त हुआ था, यह सवाल शायद पुरानी फाइलों में कहीं आराम फरमा रहा है। ताजा आदेश ने इस सवाल को फिर जगा दिया है।
मामला नगर पालिक निगम की संपदा शाखा का है। एक सहायक राजस्व निरीक्षक को संपदा का प्रभार सौंप दिया गया है। आदेश में डिप्टी कलेक्टर को नोडल अधिकारी बनाया गया है। यानी ऊपर निगरानी भी रहेगी और नीचे जिम्मेदारी भी। व्यवस्था सुनने में ऐसी कि हर तरफ व्यवस्था ही व्यवस्था नजर आए।
बस सवाल यह है कि जिस कर्मचारी का मूल काम फील्ड से जुड़ा है, वह करीब दस साल से दफ्तर में बाबूगिरी क्यों कर रहा था और अब उसे संपदा जैसी महत्वपूर्ण शाखा की जिम्मेदारी क्यों मिल गई?
फील्ड का कर्मचारी, दफ्तर की कुर्सी से पुराना रिश्ता!
नगर निगम में फील्ड कर्मचारियों की कमी कोई नई कहानी नहीं है। राजस्व वसूली से लेकर निरीक्षण तक मैदानी अमले पर काम का दबाव रहता है। लेकिन लगता है कुछ कर्मचारियों ने फील्ड से ऐसा ‘वर्क फ्रॉम ऑफिस’ रिश्ता बना लिया है कि साल गुजरते गए और कुर्सी नहीं छूटी।
करीब दस साल से कार्यालयीन काम में लगे सहायक राजस्व निरीक्षक को अब संपदा का जिम्मा मिलना इसलिए भी चर्चा में है कि फील्ड की कमी का इलाज दफ्तर की कुर्सी से कैसे हो रहा है, यह निगम का नया प्रशासनिक प्रयोग लगता है।
फील्ड में टोटा, बाबूगिरी में मोटा?
एक तरफ फील्ड में अमले की जरूरत बताई जाती है, दूसरी तरफ कर्मचारी वर्षों से कार्यालयीन काम में लगे हैं। अब सवाल यह है कि निगम में पद के हिसाब से काम बांटे जा रहे हैं या काम के हिसाब से पद?
अगर कर्मचारी फील्ड के लिए है तो उसे फील्ड में होना चाहिए। अगर बाबूगिरी ही करानी है तो फिर फील्ड स्टाफ की कमी का रोना किसलिए?
कहीं ऐसा तो नहीं कि निगम में पदनाम फील्ड का और कामकाज ‘फाइलों के बीच’ का हो गया है?
संपदा की फाइलें भी अब ‘नए हाथों’ में
संपदा शाखा में निगम की संपत्तियों, दुकान, मकान और भूखण्ड आवंटन से जुड़े महत्वपूर्ण मामले आते हैं। यानी यहां फाइल सिर्फ फाइल नहीं होती, उसके साथ निगम की संपत्ति और आम लोगों के हित भी जुड़े होते हैं।
ऐसे में सहायक राजस्व निरीक्षक को संपदा का प्रभार देने से सवाल उठना तय है। आखिर इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए यही नाम क्यों चुना गया?
आदेश में डिप्टी कलेक्टर को नोडल अधिकारी बनाकर निगरानी की व्यवस्था जरूर कर दी गई है, लेकिन सवाल फिर वही है कि जब निगरानी ऊपर है तो जिम्मेदारी नीचे किस आधार पर तय हुई?
नोडल अधिकारी ऊपर, प्रभार नीचे और सवाल बीच में!
प्रशासनिक व्यवस्था का यह नया फार्मूला कुछ ऐसा दिख रहा है कि नोडल अधिकारी ऊपर, प्रभार नीचे और सवाल बीच में खड़े हैं।
निगम प्रशासन यदि यह स्पष्ट कर दे कि संबंधित कर्मचारी को संपदा का प्रभार देने का आधार क्या है, उसकी अधिकार सीमा क्या होगी और दुकान आवंटन जैसे मामलों में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी, तो शायद कई सवालों को जवाब मिल जाए।
‘चौकीदारी’ पर सवाल, भरोसे पर नहीं
यहां सवाल किसी कर्मचारी की नीयत पर नहीं, बल्कि व्यवस्था और जिम्मेदारी तय करने के तरीके पर है। संपदा जैसी संवेदनशील शाखा में जिम्मेदारी देने से पहले अनुभव, पद की प्रकृति और काम की पारदर्शिता जैसे पहलुओं को लेकर स्पष्टता जरूरी है।
वरना नगर सरकार के इस नए प्रयोग को देखकर शहर में लोग यही पूछेंगे कि फील्ड की ड्यूटी से दस साल का विराम लेकर अब संपदा की चौकीदारी तक पहुंचने का यह सफर आखिर किस प्रशासनिक नियम-कायदे की किताब में लिखा है?
फिलहाल आदेश निकल चुका है। अब देखना यह है कि यह नगर सरकार का प्रशासनिक मास्टरस्ट्रोक साबित होता है या फिर आने वाले दिनों में इसी आदेश की फाइल से कुछ नए सवाल बाहर निकलते हैं।












