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Munna Bhai: गिरफ्तारी और थानेदारी,कलेक्टर साहब, दफ्तर को आग लगने से बचाना..बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले,राज्य सभा का राज…

गिरफ्तारी और थानेदारी…

 

कहते हैं शेर भी फंस जाता है जाल में जब अपने ही शामिल हो दुश्मन के चाल में..! शहर की ताज़ा कहानी कुछ इसी तंज के साथ गूंज रही है। फर्क इतना है कि यहां जंगल नहीं, थाना है और शिकार कोई खूंखार अपराधी नहीं, बल्कि सिस्टम की जल्दबाजी में चुना गया एक आसान निशाना है।

असल में इन  दिनों जिले में धुंआधार पुलिसिंग की चर्चा है। मगर जानकार कहते हैं कि धुआं ज्यादा है, धार कम। शहरी क्षेत्र में हुई एक टारगेट गिरफ्तारी ने इसी धुएं के बीच कई Law and Order Issue सवाल खड़े कर दिए। हालिया टारगेट गिरफ्तारी ने इसी धुएं में चिंगारी डाल दी है। मामला ऊपर तक क्या पहुंचा, थाने के भीतर सुर ऐसे बदले जैसे कोई रियाज़ चल रहा हो, हर कोई अपनी-अपनी थानेदारी का तानपुरा साधता दिखा।
हंगामा बढ़ा तो खबर सोशल मीडिया तक पहुंच गई। फिर वही सवाल, वही बहस। गिरफ्तारी कितनी मजबूत थी, कितनी मजबूरी में थी। शहर की फुसफुसाहट कहती है कि अगर यह कहानी किसी रसूखदार से जुड़ी होती तो प्रदेश भर में सुर्खियां बनतीं। मगर यहां मामला एक गरीब शख्स का था। उसने शोर नहीं किया, बस दर्द निगल लिया। सिस्टम को भी शायद यही सहज लगा।

सूत्र बताते हैं कि टारगेट पुलिसिंग का दबाव कई बार विवेक को पीछे छोड़ देता है। आंकड़े पूरे करने की जल्दी में इंसाफ की रफ्तार डगमगा जाती है। जब गिरफ्तारी सवालों में घिर जाए और थाना खुद सफाई देने लगे तो समझिए मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रहा, पूरे महकमे की साख दांव पर है।
शहर के जानकार अब कह रहे हैं कि यह सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, थानेदारी की परीक्षा थी। और इस परीक्षा में नंबर कम, नोटिस ज्यादा मिले हैं। कानून की ताकत का असर तब दिखता है जब वह संतुलित हो। वरना धुआं तो बहुत उठता है, पर आंखें भी उसी से जलती हैं और कभी-कभी सच भी। फिलहाल शहर पूछ रहा है, यह गिरफ्तारी थी या जल्दबाजी। और थानेदारी थी या टारगेट का दबाव। कटाक्ष यही है कि शेर नहीं, कभी कभी पूरी व्यवस्था ही अपने ही बुने जाल में उलझ जाती है। कुल मिलाकर समझिए मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पूरी वर्दी की इस्त्री का है, बस कहीं सिलवट दिख गई है।

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कलेक्टर साहब, दफ्तर को आग लगने से बचाना…

 

जहां राख, रेत और कोयला चोरों का है आना जाना,कलेक्टर साहब District Collector Office Controversy उस दफ्तर को आग लगने से बचाना। शहर में इन दिनों यह पंक्ति तंज की तरह तैर रही है। वजह भी खास है। मार्च क्लोजिंग नजदीक है और सरकारी दफ्तरों में अचानक “आग” की सक्रियता बढ़ गई है। ऐसा लग रहा है मानो वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने में फाइलें खुद ही धधक उठती हों..!
मार्च का महीना आते ही सरकारी दफ्तरों में एक अजीब-सी गर्माहट फैल जाती है। बाहर मौसम चाहे सुहाना हो, भीतर फाइलों का तापमान उबाल मारने लगता है।

राजधानी के आबकारी भवन में ऑडिट शुरू होने से पहले ही अग्निदेव ने हाजिरी लगा दी। ऑडिट टीम पहुंचती उससे पहले अग्निदेव निरीक्षण कर गए। कई अहम दस्तावेज और फाइलें राख हो गईं। जांच कमेटी बैठ गई है, बयान जारी हो गए हैं, मगर सवाल भी साथ ही खड़े हो गए हैं। आय व्यय का बहीखाता भी इसी आग में समा गया। संयोग कहिए या सिस्टम की गर्मी, मगर टाइमिंग बड़ी सटीक रही।

उधर रायगढ़ में मछली पालन विभाग के रिकॉर्ड रूम में रविवार को आग लग गई। छुट्टी का दिन, दफ्तर बंद, अफसर घर पर और फाइलें अकेली। आग भी जैसे कैलेंडर देखकर आती है। दोनों घटनाएं छुट्टी के दिन हुईं। यह भी एक तरह का अनुशासन है।
अब कोरबा में फुसफुसाहट है। डीएमएफ और खनिज विभाग पर निगाहें टिक गई हैं। यहां फर्जी रॉयल्टी, कागजी कार्य आबंटन और भुगतान की कहानियां पहले से चर्चा में हैं। फाइलें कई लोगों के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। ऐसे में शहर पूछ रहा है कि कहीं “शॉर्ट सर्किट” की तैयारी तो नहीं चल रही। सरकारी दफ्तरों में इन दिनों दो चीजें तेजी से जलती दिख रही हैं। एक बजट और दूसरा भरोसा। मार्च क्लोजिंग के पहले अगर फाइलें धुएं में बदलने लगें तो जनता को चिंता होना लाजिमी है। रिकॉर्ड रूम अगर बार बार आग का शिकार हों तो शक की चिंगारी भी उठती है। इसलिए यह सिर्फ कविता नहीं, जनमानस के मन की व्यथा है…जो कह रहे कलेक्टर साहब, दफ्तर को आग लगने से बचाना। क्योंकि अगर फाइलें ही राख हो गईं तो जवाबदेही किस राख से ढूंढी जाएगी…!!

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बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले…

 

 

बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले…“बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले…” ये शेर किसी आशिक़ की तड़प नहीं, बल्कि कोरबा की गलियों में गूंजती एक खास किस्म की पुलिसिया कहानी पर फिट बैठता है। फर्क बस इतना है कि यहां दिल नहीं, धंधे टूटे हैं।

वैसे तो कोरबा को ऊर्जा नगरी कहा जाता है, मगर कुछ अफसरों ने इसे चारागाह समझ लिया। आए, मलाई काटी, नेटवर्क जमाया और जब तबादले की बारी आई तो चेहरे पर शिकन ऐसे जैसे सेवा नहीं, सेवा-भावना छूट रही हो। महकमे के एक चर्चित “महाजन” भी इसी किस्म के किरदार बताए जाते हैं। पद भले सीमावर्ती जिले में संभाल रहे हों, लेकिन आत्मा अब भी कबाड़ मंडी में टहलती। ऐसा समर्पण तो संतों में भी दुर्लभ है। कहते हैं, सरकारी वायरलेस पर भले सिग्नल टूट जाए, मगर कबाड़ नेटवर्क फुल रहता था।

सूत्रधार की मानें तो साहब का जीपीएस सरकारी फाइलों से ज्यादा कबाड़ के रास्तों को पहचानता है। ड्यूटी कहीं और, दस्तक कहीं और। कहने वाले तो यहां तक कह देते हैं कि नई पोस्टिंग सिर्फ वेतन के लिए है, असली लगाव तो पुराने ठिकानों से है। कहा तो यह भी जाता है कि पुलिसिंग की परिभाषा इनके दौर में कुछ यूं बदली कि कानून किताबों में रहा और ‘सेटिंग’ मैदान में उतर आई।कोयला और कबाड़ के कारोबारियों के बीच साहब की पकड़ ऐसी रही कि लोग समझ नहीं पाए यह थानेदारी है या साझेदारी। माइंड गेम ऐसा खेला गया कि ईमानदार कर्मियों की फाइलें धूल खाती रहीं और खास लोगों की गाड़ियां चमकती रहीं।

विभाग में कुछ चेहरे इतने मायूस थे कि लगता था जैसे वे ट्रांसफर ऑर्डर नहीं, मोक्ष पत्र का इंतजार कर रहे हों। फिर एक दिन ट्रांसफर हुआ।और कमाल देखिए कुछ चेहरों पर वही मुस्कान लौटी, जो बरसों बाद बिजली आने पर पंखे में दिखती है। जैसे लंबा “मलाई-मौसम” खत्म हुआ और हवा ने आखिरकार करवट ली हो। लेकिन मोह बड़ा अजीब रोग है। कहते हैं, साहब जब भी कोरबा की तरफ रुख करते हैं तो वही पुराना गीत गुनगुनाते मिलते हैं। फर्क बस इतना है कि अब शेर में दर्द कम और कसक ज्यादा है। शायद अरमान सच में बहुत निकले, पर कम पड़ गए।फिलहाल तो गलियों में वही धुन तैर रही है…बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले…!

 

राज्य सभा का राज

 

छत्तीसगढ़ राज्यसभा की दो रिक्त सीट के लिए चुनाव की अगले महीने अधिसूचना जारी होगी। राज्यसभा सदस्य फूलोदेवी नेताम, और सुप्रीम कोर्ट के वकील केटीएस तुलसी का कार्यकाल खत्म हो रहा है। इस बार विधानसभा की संख्या बल के आधार पर भाजपा, और कांग्रेस को एक-एक सीट मिलेगी।

राज्यसभा के लिए कांग्रेस और बीजेपी में स्थानीय बनाम बाहरी चेहरों को लेकर उम्मीदवार की तलाश शुरु हो गई है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस में स्थानीय नेता को ही राज्यसभा में भेजे जाने की वकालत की जा रही है।
इस सिलसिले में पार्टी हाईकमान से चर्चा हो रही है। दूसरी तरफ, भाजपा में यह तय है कि किसी स्थानीय को ही राज्यसभा में भेजा जाएगा। कई हारे हुए बड़े नेता इसके लिए प्रयासरत हैं। कुल मिलाकर आने वाले दिनों में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल रहेगी। फिलहाल इस बार राज्यसभा में किसे मौका मिलेगा ये विधानसभा के ​बजट सत्र के बाद साफ हो जाएगा।
खबरीलाल की माने तो बीजेपी स्थानीय चेहरा को राज्यसभा में भेज सकती है वहीं कांग्रेस के लिए परेशानी की बात ये है कि प्रदेश में गुटबाजी है और पार्टी उम्मीदवार को लेकर नेताओं में एक राय नहीं बन रही है। लेकिन, जब तक उम्मीदवार फाइनल नहीं होते तब तक राज्य सभा का राज…राज ही बना हुआ है।

 

और कितने मुन्ना भाई..

 

एक दिन पहले राजधानी में गेट परीक्षा में पैसे लेकर नकल कराने वाले हरियाण गैंग के तीन मुन्नाभाई को पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ा, जो डिवाइस लगाकर प्रश्न साल्व करा रहे थे। लेकिन ये तो बाहरी गैंग था, गौर करें तो छत्तीसगढ़ में इससे भी बड़े बड़े मुन्नाभाई मौजूद हैं।
2003 की पीएससी परीक्षा में परीक्षार्थियों को रेस्ट हाउस में बैठा कर पेपर साल्व कराने वाले कई मुन्नाभाई इस वक्त जेल में बंद है। और जिन लोगों ने नकल कर परीक्षा पास की वो पिछले 10 से भी अधिक सालों से डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी बन कर अफसरी कर रहे हैं। आरआई भर्ती परीक्षा में भी पैसे लेकर जमकर नकल कराई गई।
खबरीलाल की माने तो केवल हरियाणा माडल के साल्वर गैंग को पकड़ने से पीठ नहीं थपथपाई जा सकती है। शासन प्रशासन को छत्तीसगढ़ माडल के साल्वर गैंग को सलाखों के पीछे पहुंचाना होगा, नहीं तो न जाने कितने कितने मुन्ना भाई पैसे लेकर योग्य उम्मीदवारों के हक पर डाका डालते रहेंगे।

         ✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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