मरवाही 3 फरवरी।कभी-कभी एक छोटी सी नाराज़गी भी ज़िंदगी और मौत के बीच खड़ी हो जाती है। ऐसा ही एक दिल दहला देने वाला दृश्य गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही थाना क्षेत्र में सामने आया, जहां एक 14 वर्षीय नाबालिग बच्ची चार घंटे तक अपने ही घर के कमरे में खुद को बंद कर बैठी थी। हाथ में धारदार लोहे का हंसिया था और आंखों में गुस्सा, जिद और टूटन साफ झलक रही थी।
बात पढ़ाई को लेकर हुई कहासुनी से शुरू हुई, लेकिन धीरे-धीरे मामला इतना गंभीर हो गया कि परिवार की सांसें थम सी गईं। बच्ची ने सुबह करीब 9 बजे कमरे का दरवाजा बंद किया और साफ शब्दों में कह दिया कि अगर किसी ने दबाव बनाया तो वह खुद को नुकसान पहुंचा लेगी। मां ने रो-रोकर मनाने की कोशिश की, मोहल्ले वाले आए, पार्षद पहुंचे, सहेलियों और शिक्षकों ने भी दरवाजा खटखटाया, लेकिन भीतर से सिर्फ खामोशी और डर का सन्नाटा था।
चार घंटे बीत चुके थे। बच्ची ने न कुछ खाया था, न दरवाजा खोला। हर गुजरता मिनट अनहोनी की आशंका को और गहरा कर रहा था। आखिरकार परिवार ने मरवाही पुलिस को सूचना दी।
सूचना मिलते ही पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार खिलारी, एसडीओपी गौरेला राजेश देवांगन और एसडीओपी मरवाही श्याम सिदार को अवगत कराया गया। बिना एक पल गंवाए थाना प्रभारी निरीक्षक शनिप रात्रे अपनी टीम के साथ ग्राम कुम्हारी पहुंचे।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए पुलिस ने पहले संयम और संवेदना के साथ बच्ची को समझाने का प्रयास किया। लेकिन जब अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली और खतरा बढ़ता दिखा, तो एक कठिन लेकिन जरूरी फैसला लिया गया। थाना प्रभारी ने दरवाजा तोड़ने का आदेश दिया।
जैसे ही दरवाजा खुला, सामने एक डरी-सहमी बच्ची थी, जिसके हाथ में अब भी हंसिया था। पुलिस ने बेहद सावधानी और सूझबूझ से हथियार छीना और बच्ची को सुरक्षित बाहर निकाला। उस पल न सिर्फ एक जान बची, बल्कि एक मां की टूटती उम्मीद भी फिर से जुड़ गई।
इसके बाद बच्ची को तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मरवाही ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे शारीरिक रूप से स्वस्थ बताया। पुलिस ने बच्ची और उसकी मां को समझाइश दी, भरोसा दिलाया और भावनात्मक सहारा दिया।
इस पूरे मानवीय रेस्क्यू में थाना प्रभारी निरीक्षक शनिप रात्रे के साथ सहायक उप निरीक्षक कांतिलाल वानी, प्रधान आरक्षक अशोक गौतम, आरक्षक मनोज मरावी और महिला आरक्षक कमलेश जगत की भूमिका सराहनीय रही। मरवाही पुलिस की यह कार्रवाई सिर्फ एक रेस्क्यू नहीं थी, बल्कि यह याद दिलाने वाला पल था कि खाकी सिर्फ सिर्फ कानून का नहीं, संवेदना और भरोसे का भी प्रतीक है।



