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Police Commissioner System in the New Year: थानेदार के सस्पेंशन से विभाग में टेंशन,’ कृपा’ का करिश्मा, 10 साल में कोल से करोड़ों तक का सफर..घांस और च्यवनप्राश,तेरा नाम..मेरा नाम.. बधाई हो बधाई

थानेदार के सस्पेंशन से विभाग में टेंशन…

 

कहते हैं चोर की दाढ़ी में तिनका होता है, लेकिन कोरबा पुलिस विभाग में तिनका हिलते ही पूरा विभाग कांपने लगा।

सो इन दिनों यही कहावत कोरबा पुलिस के कुछ चालबाज, या यूं कहें सुपारी किलर टाइप खाकी वर्दी के सुपरकॉप पर सटीक बैठती दिख रही है। एक थानेदार को सस्पेंड क्या कराया गया, महकमे के ठग विद्या में पारंगत अफसरों की नींद उड़ गई। जनमानस भी अब खुलकर कहने लगा है कि बिना ठोस जांच थानेदार को सस्पेंड कर देना कुछ तो गड़बड़ है।

मामला जुआरियों को संरक्षण देने का बताया गया। आरोप लगा और थानेदार निलंबित कर दिया गया। लेकिन असली सस्पेंस सस्पेंशन के बाद शुरू हुआ। सूत्रधार का कहना हैं कि जिस जुआ फड़ की आड़ लेकर थानेदार को आउट किया गया, उसका कथित सरगना आज भी बेखौफ सड़कों पर टहल रहा है। बताया जा रहा है कि उसकी सीधी-तिरछी एंट्री साइबर सेल तक है। हैरत की बात यह कि अब तक गिरफ्तारी शून्य, कार्रवाई मौन यानी मछली छोटी फंसी, मगर मगरमच्छ को VIP पास मिल गया।

कप्तान के फैसले को लेकर महकमे के भीतर खुसुर-फुसुर तेज है। जवान आपस में सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यही न्याय है या फिर काबिल अफसरों के लिए अलग पैमाना तय है। यह भी कहा जा रहा है कि जिस सेल के भरोसे जुआरियों की गिरफ्तारी कहीं और से की गई और दिखाया कहीं और किया गया, उसे देखकर हरि कथा हरि अनंता की चौपाई याद आ रही है।

बताया जाता है कि जिस फड़ के जुआरियों को पकड़ने का दावा किया जा रहा है, वह फड़ संचालक हरि साहू और उसके साथी पुलिस की पकड़ से बाहर है। जबकि हकीकत यह है कि पुलिस चाहे तो चंद घंटों में उसे गिरफ्तार कर पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठा सकती है।

अब रही बात न्याय की, तो न्याय सबका हक है। मगर निरीह टीआई किससे कहे, किसको सुनाए…@!! शायद इसी मजबूरी में विभाग के गलियारों में एक ही धुन गूंज रही है” किसको सुनाए कौन सुनेगा , इसीलिए चुप रहते है..”

E-Office and Musaddilal : थ्योरी का तंत्र, जांच का मंत्र और सच का अंतिम संस्कार..!धान के साथ मुरूम उगाइए, आय दोगुनी पाइए..!”तंत्र मंत्र के फेर में पुलिस ! काफी कम चीनी ज्यादा..या चाय कम चीनी ज्यादा!

कोरबा में ‘कृपा’ का करिश्मा, 10 साल में कोल से करोड़ों तक का सफर

कहते हैं मेहनत रंग लाती है, लेकिन कोरबा में इन दिनों यह कहावत अपडेट होकर कुछ यूं हो गई है, मेहनत के साथ अगर “ऊपर तक पहचान” हो, तो रंग नहीं, पूरा इंद्रधनुष निकल आता है। ऊर्जा नगरी में एक युवा कोल ट्रांसपोर्टर की किस्मत ऐसी चमकी कि अब उसकी तुलना देश के दिग्गज उद्योगपति अदाणी से होने लगी है। बस अंतर इतना है कि यहां पोर्ट नहीं, “पहुंच” सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर है।

चर्चा है कि हाल ही में  ट्रांसपोर्टर ने शहर से सटे करीब 10 एकड़ जमीन खरीद ली। यह खबर जैसे ही बाहर आई, शहर में खोज अभियान शुरू हो गया। लोग उस सांसद की तलाश में हैं जिनकी कृपा से कभी हजारों में घूमने वाला कारोबार, महज 10 वर्षों में हजारों करोड़ के अंपायर में तब्दील हो गया।

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि यह सब यूं ही नहीं हुआ। सही समय पर सही दरवाजे खुलना, सही फाइलें आगे बढ़ना और सही जगह पर “सहमति” मिलना, यह सब संयोग नहीं बल्कि सिस्टम की देन माना जा रहा है।
हालांकि खुले मंच से कोई कुछ कहने को तैयार नहीं है। कारोबारी चुप हैं, नेता मुस्कुरा रहे हैं और जनता हिसाब लगा रही है कि आखिर कोयले से जमीन तक की यह उड़ान किस रनवे से भरी गई।
फिलहाल कोरबा में एक ही चर्चा है यह तरक्की की कहानी है या कृपा की पटकथा, इसका खुलासा कब होगा?
कहा तो यह भी जा रहा है कि मधुर मुस्कान वाले इस कारोबारी पर छत्तीसगढ़ के एक सांसद कुछ ज्यादा ही मेहरबान हैं। अब यह मेहरबानी लोकतांत्रिक है या लाभकारी इसका उत्तर शायद समय ही देगा। तब तक आप भी घण्टा बजाइये और टन टन की गूंज में यक्ष प्रश्न से भी भारी उत्तर की प्रतीक्षा कीजिए।

 

Black gold, black money and CBI: खाकी के प्रोडक्शन हॉउस में तस्करी अपग्रेड, कोबरा की फुंफकार,कौन सुनेगा किसको सुनाए…सेंट्रल एजेंसी की आहट और अफसरों की नींद गायब,सर्दी खांसी न मलेरिया हुआ..लवेरिया हुआ

घांस और च्यवनप्राश

कोरबा में नये कलेक्टर साहेब ने प्रभार लिया..तो कुछ नया होने की उम्मीद बनी।मगर इससे यहां के कम्पोजिट बिल्डिंग में जुगाड़ जंतर से अफसरी का रुआब झाड़ रहे जिला प्रशासन के कुछ अफसर परेशान दिख रहे हैं। वैसे भी कोरबा का प्रशासनिक स्टार्टअप हमेशा चर्चा में रहा है। जिले के ज्यादातर अफसर उधारी यानी प्रभारी है जो विभाग के बड़े अफसरों के आशीर्वाद से फल फूल रहे है। अब प्रशासनिक हलकों के हालत बदलने की सुगबुगाहट हो चुकी है।

खबरीलाल बता रहे थे कि कुछ नेता नुमा अफसर अपने पुराने गड़बड़ियों पर पर्दा डालने के लिए नये आका तलाश कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि डीएमएफ की चाबी लिए फिर रहे जुगाड़ू अफसर फिर जुगाड़ में लगे हैं। पता नहीं नये साहब कब किसकी फाइल खोल बैठे। अब देखने वाली बात ये होगी कि नये कलेक्टर के आने से कम्पोजिट बिल्डिंग में क्या सुधार होता है। वैसे भी कोरबा में एक पुरानी कहावत लागू होती है.. घोड़े को घांस नसीब नहीं और … खा रहे च्यवनप्राश। देखिये आने वाले समय किसे च्यवनप्राश खाने का मौका मिलता और किसे घास नसीब होने वाली है।

तेरा नाम..मेरा नाम.. बधाई हो बधाई

बीजेपी में हाल ही में मोर्चा प्रकोष्ठों के अध्यक्षों की सूची जारी की है, जिसमें सबसे चर्चित नाम मिस्टर इंडिया का था। अब मिस्टर इंडिया कौन हैं ये बीजेपी वाले जानें। मगर, इससे भी ज्यादा चर्चा दो हमनाम रही, जहां तेरा नाम..मेरा नाम लेकर बधाई बटोरने की होड़ मची रही। बाद में पता चला जो बधाई ले रहे थे वो कोई और जिसे बधाई लेनी थी वो कोई और..।

असल में सूची में बुनकर प्रकोष्ठ में प्रदेश सहसंयोजक के पद पर नरेंद्र देवांगन का नाम देखते ही कोरबा में कैबिनेट मंत्री लखनलाल देवांगन के भाई को सोशल मीडिया में बधाई की बाढ़ आ गई। बड़े-बड़े फ्लेक्स और बैनर लगे। बाद में पता चला कि जिसे बुनकर प्रकोष्ठ में प्रदेश सहसंयोजक बनाया गया है वो रायपुर वाले नरेंद्र देवांगन हैं तो फटाफट बैनर-फ्लेक्स उतरवा दिए गए।
चलो, कोई बात नहीं बधाई लेने का सिलसिला तो शुरु हुआ। अब इसमें उनके समर्थकों का क्या कसूर जो जाने अंजाने में मंत्री के भाई को बधाई देने पहुंचे थे। वैसे भी बधाई लेना भला किसे बुरा लगा है..मगर जिस तरह से फजीहत हुई उसका क्या। असल में गलती उनकी नहीं ​बल्कि सूची जारी करने वाले की थी।

नये साल में पुलिस कमिश्नर सिस्टम

छत्तीसगढ़ की सांय सांय वाली सरकार राजधानी रायपुर में 1 जनवरी से पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने जा रही है। खबरीलाल की माने तो पुलिस कमिश्नर पद पर किसी एडीजी या आईजी रैंक के अफसर को मौका मिलेगा। लेकिन, रायपुर का पहला पुलिस कमिश्नर कौन होगा इसके लिए सीनियर अफसरों के सोशल मीडिया ग्रुप में कई नाम तैर रहे हैं।

और, सिस्टम लागू करने के लिए पुलिस मुख्यालय में कुछ जिलों के एसपी और एडीजी या आईजी रैंक के सीनियर अफसरों में फेरबदल होना है। सीएम लेबल से इसकी मंजूरी मिलते ही आईपीएस अफसरों की एक और तबादला लिस्ट इसी महीने के अंत तक जारी हो सकती है।
वैसे भी विधानसभा का मानसून सत्र खत्म होने के बाद आईपीएस अफसरों की तबादला सूची जारी होने वाली थी, मगर वीआईपी दौरा की वजह से लिस्ट टलती आ रही थी। अब नए साल से पहले इसे आलीजामा पहनाया जाएगा।
ठीक ठाक जिला मिले, इसके लिए कुछ जिलों के एसपी पीएचक्यू में अपने सोर्स से इसकी जानकारी ले रहे हैं। खबरीलाल की माने तो लंबे समय से जिलों में जमे एसपी की जगह टाइट पुलिसिंग वाले अफसरों को भेजने की तैयारी है। अब देखना है कि तबादला में कौन कौन जिले प्रभावित होते हैं।

 

✍️अनिल द्विवेदी, ईश्वर चंद्रा

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