Korba : जुगाड़तंत्र वाले अफसरों का जलवा बरकरार..प्रतिभावान अफसर आपस में कर रहे बात, राम चंद्र कह गए सिया से…

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कोरबा। प्रशासनिक दुनिया एक नई ऊंचाई पर है. अब प्रमाणिकता योग्यता और अनुभव जैसी पुरानी चीजों की जरूरत किसे है. स्टीलबॉब फिल्म का पुराना गीत खुद को बेहद अपडेटेड महसूस कर रहा है. लोग हंसते हुए गुनगुना रहे हैं “हंस चुगेगा दाना, कौव्वा मोती खाएगा” और ऊपर से आदेश आ रहा है कि ताली भी बजाओ.

जनपद पंचायत में एडीओ को मनरेगा का पीओ बनाया गया। जिम्मेदार अफसरों ने माथा पीटा, लेकिन सरकार बोली “ये प्रशासनिक स्टार्टअप है।” प्रतिभा का चीरहरण और उलटे को सीधे पर बैठाना अब प्रशासनिक फैशन है. योग्यता वाले हंस को दाना दिखाकर लाइन में लगाओ और मोती कौव्वा को देकर कहो कि सुशासन आ गया. और बात यहीं खत्म हो जाए ऐसा कैसे. शिक्षा विभाग में प्राचार्य डीईओ बनकर ज्ञान नहीं व्यापार बढ़ा रहे हैं. पोड़ी जनपद में तकनीकी सहायक पीओ बनकर चमत्कार दिखा रहे हैं. ग्रामीण यांत्रिकी सेवा में तो मजाल कि कोई नियम बीच में आए. रिटायर बाबू अलमारी की चाबी हिलाते हुए फैसले सुना रहे हैं और खुद को जिले का वनमैन आर्मी समझ रहे हैं।

कुल कहानी यही कि जिसे कल तक नोटिंग की स्पेलिंग नहीं आती थी,आज वह दूसरों को साइन सिखा रहा है. जिला अधिकारी भी आंखें मूंदकर आशीर्वाद दे रहे हैं और जनमानस सोच रहा है कि
“अरे वाह, कलयुग प्रगति कर रहा है”. अब तो लगता है आगे चलकर चपरासी कलेक्टर और कलेक्टर चपरासी को सलाह देते नजर आएंगे. और तब भी हम गीत ही गाएंगे “रामचंद्र कह गए सिया से…” क्योंकि इस प्रशासन में हंस भूखे रह सकते हैं लेकिन मोती कभी कौव्वों से दूर नहीं जाएंगे.

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