
खाकी की अर्जी, खरची और रस्सी
Government Laddus on Makar Sankranti जिले के पुलिस(police )डिपार्टमेंट में नए साल की पार्टी में इस बार पिछले साल क्या क्या खोया इसकी चर्चा कम और अर्जी, खरची और रस्सी की चर्चा ज्यादा रही। खुद विभाग के लोग भी इसके मजे ले रहे हैं। असल में कप्तान साहब ने थानों में नववर्ष मिलन की छूट क्या दी, थानेदार हथकड़ी की जगह रस्सी लेकर जनसेवा पर निकल पड़े।
बताया जा रहा है कि साहब ने जोश में नववर्ष मिलन का फरमान तो सुना दिया, मगर फंड का पता पूछना भूल गए। यानि ऊपर से आदेश, नीचे से इंतजाम। कुल मिलाकर हथकड़ी की जगह रस्सी से ही काम चलाना था। तो हथकड़ी की जगह रस्सी लेकर बकरे की तलाश में निकल पड़े।
खबरीलाल की माने तो इस मामले में जंगल वाले थाने ने कमाल का आइडिया निकाला, थाने में आए एक आरोपी को ही सप्लायर बना दिया। नकदी अलग, बकरा अलग पूरी की पूरी रेट लिस्ट पकड़ा दी।
थाने में बकरा हलाल होने की शिकायत जब साहब तक पहुंची तो तब तक तो बकरे की जान पर बन आई।महकमे में अब अर्जी, खरची और रस्सी की
चर्चा है। मगर साहब का आइडिया जिला दफ्तर से निकला है, तो…।
माइनिंग के दो अनमोल रत्न,एक निराला और दूसरा..
खनिज विभाग को अब खुदाई की ज़रूरत नहीं रही, क्योंकि विभाग के भीतर ही दो ऐसे अनमोल रत्न निकल आए हैं, जो सिस्टम को भीतर से खोद रहे हैं। खनिज विभाग के वे दो अनमोल रत्न हैं एक निराला और दूसरा ..
जी हां इस बात की चर्चा सारे खनिज संपदा के कारोबारियों में जमकर हो रही है। सूत्रधार की माने तो विभाग के इन दो अनमोल रत्न घाट – घाट जाकर रेत और खनिज परिवहन करने वाले वाहन चालकों से प्रोटेक्शन मनी वसूल रहे है।
कमांडेड के जानकारो की माने तो खनिज विभाग की ड्यूटी अब सेवा नहीं, निवेश बन चुकी है। नगर सैनिक मोटी रकम चुकाकर यहां पहुंचते हैं ताकि बाद में अवैध खनन से वसूली का भरपूर रिटर्न मिल सके। कानून यहां किताबों में रहता है और जमीन पर समझौते चलते हैं। हाल में खनिज विभाग में पदस्थ हुए निराला और उनके हमराही अवैध कारोबारियों को प्रोटक्शन देने के लिए गोपनीय मीटिंग कर रहे है। कहा तो यह भी जा रहा कि साहब की टीम जब कार्रवाई के लिए निकलती है उससे पहले ही तस्करों को सूचना मिल जाती है कि अब रेत घाट पर रेड पड़ने वाली है। यही कारण है कि ज्यादातर कार्रवाई में विभाग के अधिकारियों को सफलता नहीं मिलती है। इन दोनों रत्नों की चमक इतनी तेज है कि सूरज की चमक भी सुबह 7 बजे इनके सामने फीका पड़ जाती है। ऑफिस का समय भले 10 बजे हो, लेकिन इनकी असली हाजिरी ट्रैक्टर मालिकों के दरवाजे पर लगती है। घाट दर घाट घूमकर ये रेत का नहीं, “विश्वास” का वजन तौलते हैं और खनिज का नहीं, प्रोटेक्शन का रेट तय करते हैं।
मतलब साफ है ड्यूटी कम और अपने उद्देश्य पर ज्यादा फ़ोकस करते हैं। सीतामणी, कुदुरमाल और झीका का सफेद सोना यूं ही नहीं चमक रहा। उसके पीछे विभागीय पॉलिश है। अफसर अवैध खनन और परिवहन कर वाहनों को पकड़ने घूमते रहे है और तस्कर हाइड एंड सिक का खेल खेलते रहे..! खनिज विभाग की विफलता को लेकर लोग चटखारे लेते हुए राम लखन मूवी के सांग्स को अपग्रेड करते हुए गुनगुना रहे हैं – ” माइनिंग के दो अनमोल रत्न एक है निराला और दूसरा..!”
कुल मिलाकर, खनिज विभाग में खनन कम और चरित्र निर्माण ज़्यादा हो रहा है, लेकिन यहां चरित्र रेत जैसा है, जो हर हाथ से फिसल जाता है।
निगम की सड़क, गरीब का लुगरा
छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है.“गरीब के लुगरा आधा ढांके, आधा उघरा।”अर्थ साफ है। गरीब आदमी साड़ी का एक छोर ढकता है तो दूसरा खुला रह जाता है। आज नगर निगम की सड़कें ठीक उसी कहावत की तस्वीर बन चुकी हैं। अंतर बस इतना है कि पहले लुगरा छोटा था, अब नीयत।
कागजों में नगर निगम ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 904 करोड़ का बजट पेश किया। दावा किया गया कि सड़कों की मरम्मत और नाली निर्माण प्राथमिकता में रहेगा। जमीनी हकीकत इससे ठीक उलट है। ‘सड़’कीय सच्चाई यह है कि प्राथमिकता सिर्फ उन चेहरों को मिली जो सत्ता के चरणों में लोट लगाते रहे। नेतानुमा ठेकेदारों की तिजोरियां भरती गईं और शहर की सड़कें भरभराती गईं।
यह सही है कि जनता की रोज-रोज की कोसने के बाद पुराने कोर्ट से पुराने आरटीओ तक की सड़क बन गई, लेकिन फायदा सिर्फ ठेकेदार तक सीमित रहा। सड़क की क्वालिटी खुद चीख-चीखकर बता रही है कि बरसात आते ही इसका अंतिम संस्कार तय है। न सोल्डर है, न बोल्डर। अब आगे सड़क का क्या होगा, यह तो “राजपूत ही जाने।” वैसे भी शहर में सड़क पर टायरिंग का खेल किसी से छुपा नहीं है। एक टायर वाले नेता जी का यह फेवरेट काम रहा है। सड़क की ऊपरी सतह पर डामर चढ़ाओ और रातों-रात करोड़पति बन जाओ। यह खेल वर्षों से नेता पुत्र के संरक्षण में, भाजपा महापौर के कार्यालय की छांव में चलता आ रहा है। इस पूरे खेल में निगम के अफसर भी नेताओं के साथ कदमताल करते रहे हैं। आधी उखड़ी और आधी बनी सड़कों को देखकर अब जनता के बीच एक ही खुसफुसाहट है“ निगम की सड़क और गरीब का लुगरा” दोनों बरोबर हैं “आधा ढका, आधा उघरा।”
सुपात्र को दान..महा कल्याण
चार दिन पहले मेटल किंग वेदांता ग्रुप के लिए एक मनहूस खबर आई। कंपनी के प्रर्वतक अनिल अग्रवाल के बेटे अग्निवेश अमेरिका में स्कीइंग के दौरान हादसे में घायल हुए और अस्पताल में उपचार के दौरान उनकी जान चली गई। ये खबर वाकई दुखदायी थी। बेटे के निधन की खबर के बाद उनके पिता ने सोशल मीडिया पर जो पोस्ट शेयर की वो और भी भावुक थी।
बेटे के गम से टूटे वेदांता ग्रुप के मालिक अनिल अग्रवाल ने अपने जीवन की सारी कमाई का 75 प्रतिशत शैक्षणिक कार्यों के लिए दान करने का फैसला कर लिया। ये दान भारतीय करेंसी के अनुसार 21000 करोड़ रुपए के करीब है। लेकिन, खबर यहीं तक सीमित नहीं है..इतनी रकम से शैक्षणिक कार्यों के अलावा किसी शहर की तस्वीर और तकदीर बदल सकती है।
जीहां हम बात कर रहे हैं कोरबा के वेदांता ग्रुप की सब्सिडियरी बालको की, जो यहां एल्यूमिनियम का उत्पादन करती है। वैसे भी ये शहर पहले ही डस्ट, सरकारी जमीन पर निर्माण और कंपनी के प्लांट से निकलने वाली जहरीली गैस की समस्या से जूझ रहा है।
और तो और बालको प्लांट में हुए चिमनी हादसा में जान गंवाने वाले कई गरीब परिवार एक अदद नौकरी और कंपनी की ओर से मिलने वाली सहायता की बांट जोह रहे हैं।
वैसे इन पीड़ित परिवारों की शोक संवेदना वेदांता ग्रुप के मालिक अनिल अग्रवाल के लिए कम नहीं है मगर क्या दान की इस रकम से इन परिवारों का भविष्य नहीं संवारा जा सकता, कंपनी प्रबंधन को इस बारे में भी सोचना चाहिए। आखिर इन गरीबों ने भी अपनों को खोया है..प्लांट में हुए चिमनी हादसा के मलबे में उनके भी अरमान दबे हैं। वैसे भी शास्त्रों में कहा गया है, दान सुपात्र को देने से ही फलता है। अब प्रबंधन इस पर क्या फैसला लेता है ये देखने वाली बात होगी।
मकर संक्रांति पर सरकारी लड्डू
नया साल छत्तीसगढ़ के सरकारी मुलाजिमों के लिए लक्की रहा। आईएएस, आईपीएस और राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों का प्रमोशन हुआ और अब राज्य के अधिकारी-कर्मचारियों को केंद्र सरकार के समान 58 प्रतिशत महंगाई भत्ता भी मिलने जा रहा है। मंत्रालय महानदी भवन और संचालनालय इंद्रावती भवन में इसे मकर संक्रांति पर सरकारी लड्डू बता बता कर अफसर मजे ले रहे हैं।
वैसे भी सुशासन वाली सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में प्रवेश कर चुकी है। 2028 में चुनाव होना है ऐसे में अधिकारी-कर्मचारी का ख्याल रखना तो बनता है। अभी कर्मचारी आधार बेस उपस्थिति को लेकर सरकार को कोस रहे थे..सरकार ने हाथ में लड्डू पकड़ा दिया।
कर्मचारी भी मान रहे हैं कि ई आफिस और ई फाइलिंग चालू होने के बाद उनके हिस्से कमाई मारी गई तो कोई बात नहीं बढ़े हुए महंगाई भत्ता से उनका बजट चल जाएगा। अभी सरकार के तीन साल बचे हैं और चुनावी साल आते तक कुछ लड्डू पैकेट का जुगाड़ हो जाएगा, और सरकार ये बात अच्छी तरह समझती है।
✍️अनिल द्विवेदी ईश्वर चंद्रा



